Ghalib : you are too tough to understand ..
नक्श फरियादी है , किसकी शोखी-ए-तहरीर का
कागज़ी है पेरहन, हर पेक़रे तस्वीर का
कावे - कावे सख़्त जानीहान-ए-तन्हाई ना पूछ
सुबहा करना शाम का , लाना है जु-ए-शीर का
जज्बाए- बे - एख़्हत्टयारे-शौक़ देखा चाहिए
सीन-ए-शमशीर से बाहर है,दम शमशीर का
आगही दामेनशनidan जिस कदर चाहे बिछाए
मुद्धा आँकन है, अपने आलमे -तक़रीर का
बस के हूँ ग़ालिब असिरी में भी आतशजेरे पा
मु-ए-आताश, दीदा , है हल्का मिरी ज़ंजीर का
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